The long dark tea time of the soul

Articles by a libertarian socialist

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भ्रष्टाचार की सजा मौत हो ।

February 23rd, 2006 · No Comments

रङ्ग दे बसन्ती के पहले िदन का पहला शो देखने के बाद, मेरे और सोनाली की सोच िबल्कुल िवपिरत थी, हमेशा की तरह। जहाॅ सोनाली िफल्म के अन्त से अत्यन्त प्रभािवत थी, वही मै सोच रहा था की िफल्म मेॅ कुछ युवको द्वारा, केवल एक नेता को मार देने से िकसी भी समस्या का समाधान नही हुआ । मेरी िजरह यह थी िक भ्रष्टाचार की उत्पत्ित समाज से होती है एवॅ िकसी व्यक्ित िवशेष को मारकर इसका हल नही िकया जा सकता ।

बाद मेॅ मेरे और सोनाली के बीच मेॅ इस बात पर िववाद भी हुआ, और अपना पक्श रखने के िलए उसने रामायण का उदाहरण िदया । उसके अनुसार उस रक्शा मन्त्री (defence minister) के कृत्य पशु से कम नही थे, और पशु को ओट से मारना कोइ पाप नही होता। (यहा पशु शब्द सॅकेतात्मक है, हम दोनोॅ का पशूओॅ से बेहद लगाव है. िकसी अन्य िनषकर्ष पर ना पहूचेॅ) हालाॅिक, उस घोटाले मे और भी लोग जुडे होॅगे, लेिकन जड को काटकर उन चारोॅ ने एक अच्छा उदाहरण पेश िकया है । भ्रष्टाचार हमारे देश के, हमारे समाज के मूल से जुड गया है, अब तो अिधकाॅश राजनीितक दल इसे बुरा भी नही मानते । इसका स्थाियत्व हमारे समाज के पूर्णता का प्रतीक बन गया है । समाज को एक सही िदशा मे ले जाने के िलए ऐसा कोई कठोर कदम उठाना ही होगा । कुछ लोगोॅ को मारना ही ही होगा, कुछ को मरना ही होगा। ये अलग सवाल है की िबल्ली के गले मे घॅटी बाॅधेगा कौन? हर बार की तरह इस बार भी अन्त मेॅ मैने अपने आप को सोनाली की हाॅ मे हाॅ िमलाते हुए पाया। (मेरे िवचार से पुरूष को स्त्री से तर्क करना ही नही चािहए, पुरूष मेॅ कुछ आधारभूत किमयाॅ है िजस कारण वह कभी जीत नही सकता)
मै कोइ िफल्म सिमक्शक या आलोचक नही हूॅ, और यहा इस िफल्म के गुण-अवगुण की चर्चा नही कर रहा। हा,ॅ यह तो तय है िक शासन कभी उच्च वर्ग पर लािठ-चार्ज नही करेगा। यह िफल्म ओर अच्छी बनती, अगर िनर्देशक ने वास्तिवक्ता िदखाई होती, कश्मीर, मिणपुर, छत्तीसगढ, गुजरात, िबहार आिद मेॅ रोज हो रहे आिदवािसयो, दिलतोॅ, और गरीबोॅ पर अत्याचार से नायकोॅ को भढकाया होता । लेिकन यह भी सच है िक आज के मल्िटप्लेक्स युग के युवक-युवितयाॅ उन घटनाओॅ से खुद को जोड नही पाते ।

लेिकन कुछ तथ्य िवचारणीय है।

१. भ्रष्टाचार िहॅसा है : अिधकाॅश लोग भ्रष्टाचार को एक व्यक्ितगत एवॅ सामािजक बुराई मानते है । वह तो ये िनश्िचत रूप से है। लेिकन इसका प्रभाव और गहरा होता है। भ्रष्टाचार समाज मेॅ एक वर्ग द्वारा दुसरे कमजोर वर्गो पर िकए जा रहे िहन्सा का प्रतीक है । सरकारी कर्मचारी एवम् नेताओॅ द्वारा हो रहे बािकयोॅ के शोषण का एक स्वरूप है। यह वन रक्शा कर्िमयोॅ द्वारा आिदवािसयोॅ से हफ्ता वसूली से शुरू होता है, और प्रधानमन्तरी द्वारा अपने सािथयो के साथ रक्शा घोटाले पर खत्म होता है॥ इसके दुषफल काफी भयावह हो सकती हैॅ। लोगो को उनके मूल अिधकारोॅ से वञ्िचत िकया जाता है, लाखोॅ लोगोॅ और सैिनको की जान जोिखम मे डाल दी जाती है।

२. सबसे बढी िजम्मेदारी भ्रष्टाचािरयोॅ के पुत्र-पुत्िरयोॅ की है : मै कभी सपने मेॅ भी नही सोच सकता अगर मेरे माता-िपता भ्रष्ट होते तो मै क्या करता। क्या मै कभी उन पर गर्व कर पाता? करण िसन्घािनया ने सबसे सही काम िकया। क्या उन नेताओॅ-अफसरो की औलादोॅ को अपने माता-िपता से िघन नही होती ? अगर होती है तो वो उनसे सम्बन्ध िवच्छेद क्यो नही करते? मै उनसे आव्हान करता हूॅ की अपने घरवालौॅ के कृत्य, वे खुद उजागर करे। नही तो उन्हे भी भागीदार माना जाएगा।

३. चरमराती न्याय प्रणाली : हमारी न्याय प्राणाली अङ्गरेजो की देन है । इसे शासन द्वारा शोिषत को और दबाने के िलए ही बनाया गया है । कभी िकसी नेता, बाबू, पुलीसकर्मी, अमीर व्यवसायी को इस देश मे सजा नही हो सकती, चाहे वो िकतने ही िघनौने कृत्य क्यो ना कर ले। ऐसे मे आम जनता को क्या करना चािहए? मेरे िवचार सार्वजिनक रूप से प्रकट करना ठीक नही। लेिकन अगर न्यायालय से इॅसाफ नही िमलता तो उसे अपने हाथ मेॅ लेने मे कोई दोष नही हैॅ। और जब तक अदालत का फैसला नही आ जाता, तब तक उसका सामािजक बिहष्कार उिचत है, िवशेषकर जब वह उच्च पद पर आसीन हो ।

Tags: Current Affairs · Issues

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